मेरा हीरो
आज हीरोओं कि कोई कमी नहीं है.जहां देखिये वहां लोग अपने आप को किसी न किसी तरह का हीरो सिद्द करने की कोशिश में हैं. इनमें से सब तो सफल नहीं हो पाते, लेकिन कम से कम फिल्मी हीरो और क्रिकेट के खिलाडी लोगों के मन में घर बनाने मे सफल हो गये हैं. इसमे खुश होने की कोई बात नहीं है बल्कि हमें अपने देश की दुर्दशा पर रोना चाहिये कि जो लोग देश के निर्माण में लगे हैं उनको तो कोई याद नहीं करता, लेकिन जिनका योगदान इस क्षेत्र में नगण्य है, उनको हम पूजते हैं.
जिनको हम मन से पूजते हैं, जाने या अनजाने उनका ही अनुकरण भी करते हैं. इसका मतलब है कि यदि हमारे हीरो राष्ट्र के निर्माण मे नगण्य योगदान देते है तो हमारा योगदान भी वैसा ही होगा. वे करोडों मे वसूलते है, लेकिन राष्ट्र निर्माण फूटी कौडी के बराबर करते है. जंगल के लिये अमरबेल का योगदान भी इसी तरह का होता है — देखने में आकर्षक, लेकिन योगदान है जोंक के समान.
भारतवर्ष को अमरबेलों की नहीं, औषधी और छांव के लिये नीम की, इमारती लकडी के लिये सागौन की, और फल के लिये संतरे और आम के पेडों की जरूरत है. यह तभी हो पायगा जब जो लोग जोंक के समान सिर्फ समाज का फायदा उठा रहे है, हम उनके बदले उन लोगों का आदर और सम्मन करें जो अपनी मातृभूमि के विकास के लिये दिन रात परिश्रम कर रहे हैं. [Creative Commons: Sarathi]
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