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सच किस को भाता है

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सच किसको भाता है?

इस का किससे नाता है?

प्रश्न डोह रहा कब से ना जानें

मन समझ नही पाता है।

जो भट्क रहे अंधियारों मे

अपने ही चौबारों मे

बडे़-बड़े सपनो को लेकर

भीड़ के साथ मजबूर हुए

उन्हें विरोध नही भाता है।

सच किसको भाता है?

इस का किससे नाता है?

प्रश्न डोह रहा कब से ना जानें

मन समझ नही पाता है।

मेरा सच तेरा ना होगा

तेरा सच मेरा ना होगा

अपनी-अपनी सीमाएं हैं

अपनी-अपनी आशाएं हैं

फिर भी सच गाता है।

सच किसको भाता है?

इस का किससे नाता है?

प्रश्न डोह रहा कब से ना जानें

मन समझ नही पाता है।

झूठ खड़ा रह्ता वैसाखी पर

सच के दोनों पाँव नही हैं

सच तन्हाई में जीता है

झूठ के दसियों गाँव बसे हैं

यही गड़बड़ झाला है।

सच किसको भाता है?

इस का किससे नाता है?

प्रश्न डोह रहा कब से ना जानें

मन समझ नही पाता है।

आज का सच वही मन मानें

जो तेरे सपनें ना तोड़ें

भले यहाँ अपनोंसे मुख मोड़ें

हरिक प्याले मे यही हाला है।

ना मालूम किसने डाला है।

सच किसको भाता है?

इस का किससे नाता है?

प्रश्न डोह रहा कब से ना जानें

मन समझ नही पाता है।

खोज इसी ने भटकाया है।

सच को वेदों ने गाया है

सच को बापू ने समझाया है

अपने-अपनें तर्क सभी के

सब के पास यही छाता है।

सच किसको भाता है?

इस का किससे नाता है?

प्रश्न डोह रहा कब से ना जानें

मन समझ नही पाता है।

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July 19, 2007 - Posted by bestofhindi | Uncategorized | | No Comments Yet

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